Sunday, March 31, 2013

मैं चला देखने फिर वही सूरतें (Main Chala Dekhne Fir Wahi Suratein)

मैं चला देखने फिर वही सूरतें

मैं चला देखने फिर वही सूरतें.
मैं चला देखने उन्ही गलियों, उन्ही रास्तों पर.
जहाँ गुज़री, बचपन कि हर सुबह हर साँझ.
जहाँ बसी, खुशबू ओस में भीगी मिट्टी की.

कई बरस बाद देखा, मुहल्ले का चेहरा,
पर क्यों ख़ामोश है सभी राहें यहाँ इस तरह?
मैं अजनबी तो नहीं, यहाँ के वासिंदों के लिए, 
फिर क्यों देखते है सभी, मुझे अजनबी कि तरह?

हर तरफ ढूंढ़ती है निगाहें,
मेरी बनाई लकीरें दीवारों पर.
जाने कहाँ धूमिल हो गये गलियों से,
मेरे नन्हे क़दमों के निशान?

कभी लगता है के पीछे से, कोई दे रहा है सदा,
मुड़कर देखा तो, नज़र ना आया, कोई यार मेरा.
कभी लगता है के, कोई साथ चल रहा है मेरे,
ठहर कर देखा तो, नज़र ना आये, साया मेरा.

दूर खाट पर बैठी थी एक बुढ़िया,

पास जा मैंने कहा उसको, क्या तुम्हे याद है?
मुस्कुरा कर फेर दिया सर पर हाथ मेरे,
चूम कर माथा मेरा बोली, 
मैंने तुझे पहचान लिया.

देखी उसकी सूरत, झुर्रियों से भरी,
कैसे पहचानू अब उसे?
क्या कह पुकारूँ अब उसे?
शकलें तो अब याद नहीं,
क्या नाम दूँ अब उसे?
मन में कई कहानियां है,
पर नाम सब गुम है.
                                     --विनीत आर्य

Thursday, March 21, 2013

तेरे चेहरे का नूर (Tere Chehre Ka Noor)

तेरे चेहरे का नूर,
मेरे अल्फाजों में बयां होता है.

आती है सूरज कि रौशनी,
नाम बदल रात को,
ये चाँद को कहाँ पता होता है.
जब देखता है चाँद तुझे एक टूक,
इस बात का एहसास,
मेरी ख़ामोशी में बयां होता है.

रोशन कर देता है जब ये आफ़ताब,
तेरी कशिश को मेरे जिया में.
तेरी हर अदा मेरे बातों में बयां होती है.

शबनमी होठों पर अंगड़ाई लेती पानी कि एक बूँद मुस्कुराती है.
वो जलाती है जिया किसी का, उसको यह ख़बर कहाँ होती है.
जब बूँद ठहर तेरे होठों से रपट जाती है,
इस बात का सुकून,
मेरे दिल-ए-नवाजी में बयां होता है.
                                                                    --विनीत आर्य
Tere chehre ka noor, Mere alfazon me bayan hota hai. Aati hai suraj ki roshni, naam badal raat ko, ye chaand ko kahan pata hota hai. Jab dekhta hai chand tujhe ek took, Is baat ka ehsas, meri khamoshi se bayaan hota hai. Roshan kar deta hai jab ye aaftaab, teri kashish ko mere jiya me. Teri har ada mere baaton se bayan hoti hai. Shabnami hothon par angdai leti, paani ki ek boond muskurati hai. Wo jalati hai jiya kisi ka, usko yeh khabar kaha hoti hai. Jab Boond thahar tere hothon se rapat jati hai, is baat ka Sukuun, Mere dil-e-nawaji me bayan hota hai. --Vineet Arya

Tuesday, February 26, 2013

आज तो आई है क़यामत ( Aaj To Aai Hai Qayamat)

आज तो आई है क़यामत, मेरे इश्क का चोला ओढ़ कर.
अब परवाह है किसे जान की, देखने दो मुझे रंग मेरे इश्क का.
                                                                         --विनीत आर्य




Aaj to aai hai qayamat mere ishq ka chola odh kar.
Ab parwaah hai kise jaan ki, dekhne do mujhe rang mere ishq ka.
                                                                                         --Vineet Arya

देखते है अब कौन क्या लिखता है(Dekhte Hai Ab Kaun Kya Likhta Hai)

क्यों करते है लोग इश्क, 
ये फ़लसफ़ा मुझे समझ नहीं आता,
चलो खोल दिए मैंने कोरे पन्ने अपनी जिंदगी के,
देखते है अब कौन क्या लिखता है.
   
                                     --विनीत आर्य


Kyun karte hai log ishq, 
Ye falasfaha mujhe samajh nahi aata,
Chalo khol deye maine kore panne apni zindgi ke,
Dekhte hai ab kaun kya likhta hai.

                                    -Vineet Arya


अर्थ:
फ़लसफ़ा = falasafa = Philosophy


जिया ग़ालिब है (Jiya Ghalib Hai)

जिया ग़ालिब  है, ग़ालिब विनीत है.
देख मेरे रंग को, तेरा हर रंग मामूली है.

                                     -विनीत आर्य



Jiya ghalib hai, ghalib vineet  hai.
dekh mere rang ko, tera har rang mamuli hai.

                                     -Vineet Arya



वर्णन:
दिल जो जीत लेता है वो शिष्ट है.
देख इसकी अच्छाइयों को, तुम्हारी सब अच्छाई बेकार है.

Vineet = decent; 
Ghalib = victorious; 
Rang = good qualities/characteristics


Tuesday, January 15, 2013

मोरी अलबेली सी बातें (Mori Albeli Si Baatein)

मोरी अलबेली सी बातें,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या इश्क दा रोग लागा मोसे?
या कोई बात सताए?


मोरी सजीली सी निगाहें,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या छुपये तोरे ये नैना मोसे?
या कोई सवाल सताए?


मोरी नरम सी साँसे,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या लगन सी लगी मोसे?
या कोई ज़ज्बात सताए?


मोरी धीमी सी मुस्कान,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या लज्जाये तोहे मोसे?
या कोई ख़याल सताए?

 
मोरी अलबेली सी बातें,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या इश्क दा रोग लागा मोसे?
या कोई बात सताए?
                               

                                     -विनीत आर्य

Tuesday, January 1, 2013

क्या कहें हम उन्हें (Kya Kahein Hum Unhe)

जब बड़ी खामोशी से,
देखते है वो हमें,
तब समझ न आये,
क्या कहें हम उन्हें!

बात सिर्फ इश्क की होती तो,
मान भी जाते,
वो बेवफा निकले तो,
क्या कहें हम उन्हें!

रंज मुझे उनकी बेवफाई से नहीं,
गम मुझे उनकी जुदाई का है.
शायद अच्छा होता अगर,
जुदा हो कर मर जाते हम.
मगर जी गए है तो,
क्या कहें हम उन्हें!

इतना आसान होता अगर,
इश्क कर भूल जाना,
तो कब के  भूल गए होते.
वो हमें नासमझ समझे तो,
क्या कहें हम उन्हें!

किसी दिन किसी मोड़ पर,
वो हमें आ मिले,
दे इश्क की दुहाई वो,
इश्क का क़तल करने को कह गए हमें,
बेवफा, अगर हम क़ातिल होते,
तो कब का क़तल कर दिए होते.
वो हमारे इश्क को न समझे तो,
क्या कहें हम उन्हें!
                                        -विनीत आर्य

Thursday, December 20, 2012

कोई है यहाँ कहाँ(koi hai yahan kahan)

छोटी सी ख्वाहिशें , ले चली दूर मुझे,
आँखों में सपने, कुछ है सजे,
सपने बाट सकूं, कोई है यहाँ कहाँ!

मेरी मंजिलें, अभी दूर बहुत,
सामने, घनी रात बहुत,
सोचता हूँ, कोई पास हो मेरे.
जिसे अपना हाथ बढ़ा सकूं,
हाथ थाम सके, कोई है यहाँ कहाँ!


वक़्त की गर्मी से निकले, मेरे कई अरमान,
अरमानो को समेट, आग में जला सकूं,
आग जैसे चीज़, कोई है यहाँ कहाँ!


                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)

Sunday, December 16, 2012

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को (Likhta Jab Main, Teri Ghazal Ko)

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
मुझे याद तेरा मुस्कुराना आता है|
जब देख मुझे, तू कुछ ऐसे मुस्कुराती है,
जैसे कोई राज़ पढ़ लिया हो, मेरे चहरे से|
तेरी आँखों की सरगोशियाँ,
कोई शिकायत कर रही हो मुझसे |
जैसे कोई तीर चलाया हो तुमने अँधेरे में,
और आ लगा हो ठीक निशाने पर|

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
तो याद तेरी जुल्फें आती है|
जब तेरी जुल्फों से, एक लट नीचे उतर आती है,
बलखाती शर्माती, चुपके से तेरे गालों को चूम लेती है|
जैसे इसे तेरी इजाज़त मिली हो,
तुझ से कोई शरारत करने की|

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
तो याद तेरी कई बातें आ जाती है|
एक बेखुदी का आलम बना जाती है|
जैसे मुझे पागल कर गई है तू,
और मेरा पागलपन ढूँढ रहा है तुझे|

                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)

Monday, December 3, 2012

अपनी सी ये जिंदगी ( Apni Si Ye Zindgi)


टूटी - टूटी, है मेरी ये जिंदगी,
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी| -2

ख्वाबो में रहता हूँ,
ख्वाब बुनता हूँ,
अक्सर, ये ख्वाब, टूट जाते है|
दर्द भी होता है,
दिल भी रोता है,
कुछ खोया सा, लगता है, इस जिंदगी को|
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी.

घर से, निकलता हूँ,
कुछ दूर चलता हूँ,
अक्सर, ठोकर लग, गिरता हूँ,
मुस्कुरा कर रोता भी हूँ,
पलकों में पानी ला, हँसता भी हूँ,
आखिर में, जी भर, कोसता हूँ, इस जिंदगी को|
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी|



टूटी - टूटी, है मेरी ये जिंदगी,
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी| 

                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)