छोटी सी ख्वाहिशें , ले चली दूर मुझे,
आँखों में सपने, कुछ है सजे,
सपने बाट सकूं, कोई है यहाँ कहाँ!
मेरी मंजिलें, अभी दूर बहुत,
सामने, घनी रात बहुत,
सोचता हूँ, कोई पास हो मेरे.
जिसे अपना हाथ बढ़ा सकूं,
हाथ थाम सके, कोई है यहाँ कहाँ!
वक़्त की गर्मी से निकले, मेरे कई अरमान,
अरमानो को समेट, आग में जला सकूं,
आग जैसे चीज़, कोई है यहाँ कहाँ!
-ड्यूक (विनीत आर्य)
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में लिए चलता हूँ
जाने कब रुक जाये सफर ज़िन्दगी का
सारी यादें साथ लिए चलता हूँ
ग़ज़लें नहीं आप बीती है ये
सारे नग़में गुनगुनाते-गाते चलता हूँ
--विनीत आर्य
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Thursday, December 20, 2012
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