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Wednesday, May 29, 2013

धड़क जा धड़क जा, ऐ दिल धड़क जा (dhadak ja dhadak ja, aye dil dhadak ja)

धड़क जा धड़क जा,
ऐ दिल धड़क जा।
सांसें रुकी है,
दम है घुटा।
धड़क जा धड़क जा।

सीने में है दर्द होता,
आँखों में है पानी भरा। 
देख तू इस ओर जरा, 
क्या हाल हुआ है मेरा।
 धड़क जा धड़क जा,
ऐ दिल धड़क जा।

अकेला नहीं है तू दुनिया में,
साथ हूँ मैं तेरे।
फैली है दूर तक मायूसियाँ - खामोशियाँ,
तेरे जागने का इंतज़ार है अब,
धड़क जा धड़क जा,
ऐ दिल धड़क जा।

देख काली बदरिया है आई,
मैंने कहा है उसे,
बरस जा बरस जा,
ऐ दिल धड़क जा।

सूखी ज़मीन पर,
सूखे है प्राण मेरे।
प्यासा है दिल, 

तडपे है मन मेरा,
तन को भिगो दे। 

 आज जी भर के,
बरस जा बरस जा,
ऐ दिल धड़क जा। 


आँखों की नदियाँ गई है सूख,
दोबारा जल भर दे इन नैनों में।

नैना उम्मीद लगाये बैठे है,
ना ठुकरा इनकी गुज़ारिश को।
एक दफा तू
,
 बरस जा बरस जा,
ऐ दिल धड़क जा। 

बदरिया अब और न तरसा,
देख ये दिल नहीं धड़कता।
होश में हूँ अभी,
मेरे सोने से पहले बरस जा।
धड़क जा धड़क जा,
ऐ दिल धड़क जा। 
                           --विनीत आर्य 
Dhadak ja dhadak ja, aye dil dhadak ja. Saansein ruki hai Dam hai ghuta, Dhadk ja dhadak ja. Seene me hai, dard hota, Ankho me hai, pani bhara, dekh tu is taraf jara, kya haal hua hai mera, Dhadk ja dhadak ja, aye dil dhadak ja. Akela nahi hai tu duniya me. Saath hoon main tere. Faili hai door tak mayusia, Tere jagne ka intezar hai ab, Dhadk ja dhadak ja, aye dil dhadak ja. Dekh kali badariya hai aai. Maine kaha hai use, baras ja baras ja, aye dil dhadak ja. Sukhi zameen par, sukhe hai pran mere. Pyaasa hai dil, tadpe hai mann mera, Tan ko bhigo de, Khila de chaman zameen par. Akhiyan ki nadiyan gai hai sukh. dobara jal bhar de in naino me. baras ja baras ja, aye dil dhadak ja. Badariya ab aur na tarsa, dekh ye dil nahi dhadakta. Hosh me hoon abhi, mere so jane se pehle baras ja. Dhadk ja dhadak ja, aye dil dhadak ja. --Vineet Arya

Tuesday, January 1, 2013

क्या कहें हम उन्हें (Kya Kahein Hum Unhe)

जब बड़ी खामोशी से,
देखते है वो हमें,
तब समझ न आये,
क्या कहें हम उन्हें!

बात सिर्फ इश्क की होती तो,
मान भी जाते,
वो बेवफा निकले तो,
क्या कहें हम उन्हें!

रंज मुझे उनकी बेवफाई से नहीं,
गम मुझे उनकी जुदाई का है.
शायद अच्छा होता अगर,
जुदा हो कर मर जाते हम.
मगर जी गए है तो,
क्या कहें हम उन्हें!

इतना आसान होता अगर,
इश्क कर भूल जाना,
तो कब के  भूल गए होते.
वो हमें नासमझ समझे तो,
क्या कहें हम उन्हें!

किसी दिन किसी मोड़ पर,
वो हमें आ मिले,
दे इश्क की दुहाई वो,
इश्क का क़तल करने को कह गए हमें,
बेवफा, अगर हम क़ातिल होते,
तो कब का क़तल कर दिए होते.
वो हमारे इश्क को न समझे तो,
क्या कहें हम उन्हें!
                                        -विनीत आर्य

Thursday, December 20, 2012

कोई है यहाँ कहाँ(koi hai yahan kahan)

छोटी सी ख्वाहिशें , ले चली दूर मुझे,
आँखों में सपने, कुछ है सजे,
सपने बाट सकूं, कोई है यहाँ कहाँ!

मेरी मंजिलें, अभी दूर बहुत,
सामने, घनी रात बहुत,
सोचता हूँ, कोई पास हो मेरे.
जिसे अपना हाथ बढ़ा सकूं,
हाथ थाम सके, कोई है यहाँ कहाँ!


वक़्त की गर्मी से निकले, मेरे कई अरमान,
अरमानो को समेट, आग में जला सकूं,
आग जैसे चीज़, कोई है यहाँ कहाँ!


                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)

Sunday, December 16, 2012

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को (Likhta Jab Main, Teri Ghazal Ko)

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
मुझे याद तेरा मुस्कुराना आता है|
जब देख मुझे, तू कुछ ऐसे मुस्कुराती है,
जैसे कोई राज़ पढ़ लिया हो, मेरे चहरे से|
तेरी आँखों की सरगोशियाँ,
कोई शिकायत कर रही हो मुझसे |
जैसे कोई तीर चलाया हो तुमने अँधेरे में,
और आ लगा हो ठीक निशाने पर|

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
तो याद तेरी जुल्फें आती है|
जब तेरी जुल्फों से, एक लट नीचे उतर आती है,
बलखाती शर्माती, चुपके से तेरे गालों को चूम लेती है|
जैसे इसे तेरी इजाज़त मिली हो,
तुझ से कोई शरारत करने की|

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
तो याद तेरी कई बातें आ जाती है|
एक बेखुदी का आलम बना जाती है|
जैसे मुझे पागल कर गई है तू,
और मेरा पागलपन ढूँढ रहा है तुझे|

                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)

Monday, December 3, 2012

अपनी सी ये जिंदगी ( Apni Si Ye Zindgi)


टूटी - टूटी, है मेरी ये जिंदगी,
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी| -2

ख्वाबो में रहता हूँ,
ख्वाब बुनता हूँ,
अक्सर, ये ख्वाब, टूट जाते है|
दर्द भी होता है,
दिल भी रोता है,
कुछ खोया सा, लगता है, इस जिंदगी को|
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी.

घर से, निकलता हूँ,
कुछ दूर चलता हूँ,
अक्सर, ठोकर लग, गिरता हूँ,
मुस्कुरा कर रोता भी हूँ,
पलकों में पानी ला, हँसता भी हूँ,
आखिर में, जी भर, कोसता हूँ, इस जिंदगी को|
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी|



टूटी - टूटी, है मेरी ये जिंदगी,
देखोगे जब तुम इसे करीब से,
पाओगे तुम, अपनी सी ये जिंदगी| 

                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)