जब बड़ी खामोशी से,
देखते है वो हमें,
तब समझ न आये,
क्या कहें हम उन्हें!
बात सिर्फ इश्क की होती तो,
मान भी जाते,
वो बेवफा निकले तो,
क्या कहें हम उन्हें!
रंज मुझे उनकी बेवफाई से नहीं,
गम मुझे उनकी जुदाई का है.
शायद अच्छा होता अगर,
जुदा हो कर मर जाते हम.
मगर जी गए है तो,
क्या कहें हम उन्हें!
इतना आसान होता अगर,
इश्क कर भूल जाना,
तो कब के भूल गए होते.
वो हमें नासमझ समझे तो,
क्या कहें हम उन्हें!
किसी दिन किसी मोड़ पर,
वो हमें आ मिले,
दे इश्क की दुहाई वो,
इश्क का क़तल करने को कह गए हमें,
बेवफा, अगर हम क़ातिल होते,
तो कब का क़तल कर दिए होते.
वो हमारे इश्क को न समझे तो,
क्या कहें हम उन्हें!
-विनीत आर्य
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में लिए चलता हूँ
जाने कब रुक जाये सफर ज़िन्दगी का
सारी यादें साथ लिए चलता हूँ
ग़ज़लें नहीं आप बीती है ये
सारे नग़में गुनगुनाते-गाते चलता हूँ
--विनीत आर्य
Showing posts with label kaatil. Show all posts
Showing posts with label kaatil. Show all posts
Tuesday, January 1, 2013
Subscribe to:
Posts (Atom)
