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Tuesday, January 15, 2013

मोरी अलबेली सी बातें (Mori Albeli Si Baatein)

मोरी अलबेली सी बातें,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या इश्क दा रोग लागा मोसे?
या कोई बात सताए?


मोरी सजीली सी निगाहें,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या छुपये तोरे ये नैना मोसे?
या कोई सवाल सताए?


मोरी नरम सी साँसे,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या लगन सी लगी मोसे?
या कोई ज़ज्बात सताए?


मोरी धीमी सी मुस्कान,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या लज्जाये तोहे मोसे?
या कोई ख़याल सताए?

 
मोरी अलबेली सी बातें,
काहे करे परेशान तोहे?
क्या इश्क दा रोग लागा मोसे?
या कोई बात सताए?
                               

                                     -विनीत आर्य

Sunday, December 16, 2012

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को (Likhta Jab Main, Teri Ghazal Ko)

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
मुझे याद तेरा मुस्कुराना आता है|
जब देख मुझे, तू कुछ ऐसे मुस्कुराती है,
जैसे कोई राज़ पढ़ लिया हो, मेरे चहरे से|
तेरी आँखों की सरगोशियाँ,
कोई शिकायत कर रही हो मुझसे |
जैसे कोई तीर चलाया हो तुमने अँधेरे में,
और आ लगा हो ठीक निशाने पर|

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
तो याद तेरी जुल्फें आती है|
जब तेरी जुल्फों से, एक लट नीचे उतर आती है,
बलखाती शर्माती, चुपके से तेरे गालों को चूम लेती है|
जैसे इसे तेरी इजाज़त मिली हो,
तुझ से कोई शरारत करने की|

लिखता जब मैं, तेरी गज़ल को,
तो याद तेरी कई बातें आ जाती है|
एक बेखुदी का आलम बना जाती है|
जैसे मुझे पागल कर गई है तू,
और मेरा पागलपन ढूँढ रहा है तुझे|

                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)