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Monday, August 26, 2013

सपने जो मैं देखता हूँ (Sapne Jo Main Dekhta Hoon)


सपने जो मैं देखता हूँ,
सच है या झूठ देखता हूँ,
आँखों में ये बसे है,
क्या रख लूं , क्या बेच दूं, सोचता हूँ।

रंगों में जो मैं घिरा हूँ,
ख़ुशी हो या गम देखता हूँ,
खूबसूरत बनानी है मुझे मेरी दुनिया,
क्या रंग लूं, क्या छोड़ दूं, सोचता हूँ।

                                    --विनीत आर्य 
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Thursday, December 20, 2012

कोई है यहाँ कहाँ(koi hai yahan kahan)

छोटी सी ख्वाहिशें , ले चली दूर मुझे,
आँखों में सपने, कुछ है सजे,
सपने बाट सकूं, कोई है यहाँ कहाँ!

मेरी मंजिलें, अभी दूर बहुत,
सामने, घनी रात बहुत,
सोचता हूँ, कोई पास हो मेरे.
जिसे अपना हाथ बढ़ा सकूं,
हाथ थाम सके, कोई है यहाँ कहाँ!


वक़्त की गर्मी से निकले, मेरे कई अरमान,
अरमानो को समेट, आग में जला सकूं,
आग जैसे चीज़, कोई है यहाँ कहाँ!


                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)