Wednesday, November 28, 2012

यादों का मंजर (Yaadon Ka Manzar)

आज फिर एक गज़ल लिखता हूँ,
कुछ भूली कुछ बिछड़ी दास्ताँ लिखता हूँ,
शायद, कुछ पल के लिए वो मंजर लौट आये,
जिसे मैं, ता उम्र याद करता हूँ|

फ़ुरसत मिले तो, वो पुरानी किताबें खोलना,
जिन्हें मैं ले तेरे घर के आगे भीगा हूँ,
शायद, उसमें कुछ पैसे आज भी रखे हो,
जिसे मैं, तुम पर खर्च करने की आज भी सोचता हूँ|

जो तु ने उस दिन रुमाल दिया था मुझको,
आज भी सोता हूँ, साथ में लेकर उसको,
शायद, उसमें तेरी कुछ महक रह गई हो,
जिसे मैं, ता उम्र पाने की चाह करता हूँ|

एक दफा साइकिल पर, घर से स्टेशन रेस लगी थी,
वो रेस तो मैं हार गया, जब तु मुझे गले लगी थी,
शायद, स्टेशन की वो भीड़ तुझे याद हो,
जहाँ मैं, तुझ को ढूँढने आज भी जाता हूँ|

एक दिन तेरी ज़िद थी, बाग़ से एक गुलाब तोड़ लाने की,
मैं एक गुलाब तोड़ लाया, तेरी एक फरमाइश पर,
शायद, वो गुलाब तुमने फेंक दिया हो,
वहां से मैं,  ता उम्र एक गुलाब चुराता लाया हूँ|

                                                     -ड्यूक (विनीत आर्य)

Friday, November 23, 2012

गुस्ताख हूँ, गुस्ताखियाँ करता हूँ (Gustakh Hoon, Gustakhiyan Karta Hoon)

पानी से भीगी उस टहनी को देखो,
उसकी आँखों से बहते आँसुओं को देखो,
हवा की टहनी से गुस्ताखी को देखो|
पीपल के पत्ते पर ठहरी उस बूँद को, पत्ते से दूर करता हूँ|
गुस्ताख हूँ, गुस्ताखियाँ करता हूँ|

उन नन्हे बच्चो को रेत के घर बनाते देखो,
उनकी झूठी- मूठी कहानी को देखो,
समुंदर पर इठला कर चलती है लहरें,
लहरों की बच्चो से गुस्ताखी को देखो|
साहिल पर पड़े पत्थर को फेंक, समुंदर को चोटिल करता हूँ|
गुस्ताख हूँ, गुस्ताखियाँ करता हूँ|

आसमान को धरती के लिए हाथ फैलाते देखो,
उसी उदासी को उस के नीले रंग में देखो,
आसमान में उड़ते परिंदे, जसे पहरा लगा रहे हो,
परिंदों की दो प्रेमियों से गुस्ताखी को देखो|
हवा में उड़ती बुलबुल को, मैं क़ैद करता हूँ|
गुस्ताख हूँ, गुस्ताखियाँ करता हूँ|

ऊपर रंग बदलते चाँद को देखो,
उसकी नारंगी सी चांदनी को देखो,
देखता है जब वो इस धरा को,
बादल की चाँद से गुस्ताखी को देखो|
बिना तेरी इजाज़त, प्यार मैं तुम से करता हूँ|
गुस्ताख हूँ, गुस्ताखियाँ करता हूँ|

                                                   -ड्यूक (विनीत आर्य)

Sunday, November 18, 2012

अजनबी (Ajnabee)

मिलते है अब्सार उस अजनबी से,
एक परिचय की ख्वाहिश से.
रहमत कर ए खुदा मुझ पर,
रोक दे इस पल को, तु किसी तरह से।
                                                      -विनीत आर्य





Meelte hai absaar us ajnabi se,
Ek paichay ki khwaahish se.
Rehmet kar aye khuda mujh par,
Rok de ish pal ko, tu kisi tarha se.

                                                    -Vineet Arya

अब्सार (absaar)  = आँखे

ढूँढ रहा अपनी तकदीर मैं (Dhoond Raha Apni Takdeer Main)

टूट कर गिरा शाख से,
न दोस्त है, न दोस्ताना|
उड़ता हूँ हवा के साथ साथ,
न घर है न ठिकाना|
खो बैठा अपनी पहेचान मैं,
ढूँढ रहा अपनी तकदीर मैं|

                                -ड्यूक (विनीत आर्य)

Friday, November 16, 2012

परिचय (Parichay)

मैं पहुँचा गया एक महफ़िल में.
महफ़िल थी दीवानों की, परवानो की|
हर कोई अपनों में खोया था,
उनको कहाँ खबर थी हम दिलवालों की|
हमने भी ये सोचा, छोडो इन बेगानों को,
हुस्न है, शमा है, मजा लो इन नज़रो का|

कुर्सी पर बैठा, एक छोर से, सबको देख रहा था,
कोला कॉफ़ी गटक रहा था|
मेहता आंटी इतरा रही थी,
साड़ी का पल्लु 
दिखा औरों को जला रही थी|

नज़र उधर से हटी तो, एक महजबीना पर आ टिकी|
लाल सूट में, रंग गेहुँआ, लगती वो परी थी,
होठों पे मुस्कान, लबों पे शबनमी,
चेहरा का नूर, आँखों की नवाज़िशे उनकी,
कर गई मजबूर एक ग़ज़ल कहने को|
कि इस कदर मत बरसो के, कहीं उसमें डूब जाऊं.
अभी तो जाम होठों से छुआ नहीं, कहीं मैं बहक जाऊं|

इसी अंजुमन में, उनसे परिचय का ख्याल मन में आया|
पर देखकर उनकी अम्मा को दिल ही दिल घबराया|
सोचा-विचारा, बहलाया-फुसलाया, फिर मुज़तर दिल को धमकाया|
इतने में नाजाने कहाँ से एक अजनबी-परिचित सामने आया|
नाम ले हमें पुकार रहा था, एक छोटी सी गुज़ारिश कर रहा था,
गुज़ारिश थी उनके अपनों से परिचय की, मैंने भी झट से हाँ कर दी,
वो ले आये उस मेज तक, जहाँ कुछ देर पहले निगाह हमारी थी|
दिल मुस्कुरा रहा था, दिल खिल-खिला रहा था,
ये मैं ज़ाहिर करता भी कैसे, उसका बाप उसी से मिलवा रहा था|

                                                                                    -ड्यूक (विनीत आर्य)

Monday, November 12, 2012

मेरे महबूब के नैनों से (Mere mehboob k naino se)

बूँद बूँद कर इश्क है गिरता,
मेरे महबूब के नैनों से|
घूंट घूंट पी, नशा है होता,
मेरे महबूब के नैनों से|

                      -ड्यूक (विनीत आर्य)

Saturday, November 10, 2012

मैं चला, यूंही चला (Main Chala younhi Chala)

मैं चला, यूंही  चला,
चुरा कर ए जिंदगी  तुझे, मैं  चला,
मुस्कुरा कर, झिलमिला कर, मैं  चला,
मंजिल को पाने, किसको अपना बनाने, मैं चला,
खुशियों के गीत होठों पर लेकर,
लहरों से लड़ते झगड़ते, मैं चला ,
इन खाली रास्तों पर,
थामने किसी का हाथ,
करने दो मुलाकातें,
मैं चला, यूंही चला|

बेखबर, बे-शहर, मैं चला,
छूने उसे, कुछ कहने उसे, मैं चला,
गुब्बार से, आंधी से होकर ,
एक नज़र भर देखने उसे, मैं चला,
उसी पर फ़िदा,
उसी पर फ़ना हो चला,
मैं चला, यूंही चला|

                         -ड्यूक (विनीत आर्य)

Sunday, August 1, 2010

Yaar mere, ek haadsha ho gaya

Yaar mere; ek haadsha ho gaya...
Dil mera, uski gaadi ke neeche aa gaya...
Khubsoorat thi woh, masoom thi woh...
Jhatse, dil ko utha seene se laga liya...

yaar mere; ek haadsha ho gaya...
Lamha badalta raha, main wahein khada raha...
Bheed mein tanhai ko mehsoos karta raha...
Najar unse hatti nahi thi...
zamana dekhne nahi de raha tha...
woh door se muskurati rahi...
Hum auron ko dekhte reh gaye...
Sama badalta raha, afsana wahi tha...

yaar mere; ek haadsha ho gaya...
Julf unki udh kar hoton ko choom rahi thi...
Hawa bhi apne mannmane dhangse chal rahi thi...
Kabhi unse toh, kabhi humse sararat kar rahi thi...
Badi khamoshi se woh kuch kahte rahe...
Hum use khamoshi se sunte rahe...
Woh hoton ko daaton mein daba...
adayein badalte rahe, andaz wahi tha...

yaar mere; ek haadsha ho gaya...
Dil jo mera uske paas tha...
Main dil se kehta raha...
Dhadak aahista se aye dil...
kahin unse phisal na jaye...
kahin phir ek haadsha na ho jaye...

yaar mere; ek haadsha ho gaya...
yaar ek fasana ho gaya...
-- By dUke (Vineet Arya)

Friday, March 7, 2008

Ye Barish Ki Pehli Bundein

Woh barish ki bundon ka girna, sote pani ko apni takkar se jagana.
Woh paton par inka thirkna, dharti ko bhigo kar, use mekha dena.
Woh medhak ka khush hona, aur fir shor macha kar apni khushi ka izzhar karna.
Dil ki bechani ko aur badha dena, khabon ko bunne ke liye aur uksa dena.
Ye barish ki pehli bundein, haan ye barish ki pehli bundein.
Woh bachon ko school se chutti marne ka bahana.
Barish ke mausam mein kuch kaam na karna, bas chai sang pakode chakhna.
Woh barish ki bundon ka chat par padna, TAAN SEN ki taan ko phir se sajha dena.
Mann mein aadhe – poore geet utha dena, un geethon ke sang jor-jor se gana.
Ye barish ki pehli bundein, haan ye barish ki pehli bundein.
Woh barish ki boudein ka, sukhe nadiyoun-naaloon mein fir se jaan phookh dena.
Sadak ke gadhon mein bharkar apna adhikar jama lena,
Aate Jate logon ke sang bin holi ke kichad sang holi khelna.
Phir joor joor se khilli udana.
Yeh barish ke pehli bundein, haan ye barish ki pehli bundein.
Woh raahgiron ka teji se ghar ki or lapakna,
Barish se bachna aur bachkar bhi gila ho jana.
Apne saath barish ko ghar leaana, apne ko aadha sukha - aadha gila pana.
Woh mummy ka darwaje par hi keh dena, haar taraf pani pani na karma,
Jaldi se kapde badal lo, main chai bana deti hoon.
Woh gharwalon ka mujhe gila dekh kar muskurana.
Dil mein ek halki si jalan ka hona , Us jalane ki khusboo ko phir yaad delna.
Yeh barish ke pehli bundein,haan ye barish ki pehli bundein.

-By Vineet Arya …

Thursday, November 29, 2007

Aane ka intezar

Mere hothon ko bas teri ek muskurahat ka intezar tha.
Meri sanson ko teri khushboo ka intezar tha.
Khil toh yeh gul bohut phele jate,
Inhe toh bas teri aane ki aahat ka intezar tha.

Hawa ki tarah tujhe choone ki hasrat hai mann mein.
Tumhe apna bannane ki chahat hai dil mein.
Kehna toh bahut kuch hai tumse,
Bas tere saamne aane ka intezar hai....
                                                                        -by Vineet Arya